सहस्रार अमृत मंत्र साधना

सहस्रार चक्र मंत्र साधना

सहस्त्रार चक्र कुण्डलिनी जागरण शिव अमृत तत्व साधना
सहस्त्रार चक्र कुण्डलिनी

आध्यात्म जगत की सभी विविध प्रणाली में कुण्डलिनी का स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है. मनुष्य के अंदर ब्रह्मांडीय मुख्य शक्ति के रूप में कुण्डलिनी अवस्थित है. इसी कुण्डलिनी के अनंत क्रम को सम्प्पन करने के लिए विविध मार्ग में विविध पद्धतियाँ है और यही कुण्डलिनी मनुष्य का उसकी स्वयं की विराट सत्ता का साक्षात्कार कराता है. चाहे वह पारदविज्ञान हो सूर्यविज्ञान मंत्र, योग तंत्र या कोई भी क्षेत्र, इन सभी का आधार कुण्डलिनी ही है. और इसी कुण्डलिनी के सप्तम चक्र को सहत्रार चक्र कहा गया है.
कुण्डलिनी के मूल स्थान को मूलाधार कहा गया है जिसे शक्ति का स्थान कहा जाता है, जब की उसकी यात्रा एक एक चक्र का चेतन, जागरण, भेदन, विकास आदि विविध चरणों में होता है, तथा कुण्डलिनी शक्ति की यह मूल यात्रा उसके शिव के साथ मिलन के लिए है यह सर्व तंत्र ग्रन्थ स्वीकार करते है. यही चक्र सहस्त्रार है, जिसको सहस्त्र पद्मदल अर्थात १००० कमल पंखुड़ी वाला स्थान कहा जाता है, जिसे शिव का स्थान माना जाता है.
सहस्त्रार चक्र सर्वोच्च तत्व, परम तत्व का स्थान है. इसी स्थान से मनुष्य स्व भाव की वासना से मुक्त हो कर ब्रह्म भाव के सत्य की और बढ़ता है तथा समाधि अवस्था को प्राप्त करता है. अगर शरीर का पूर्ण प्राण एक हो कर सहस्त्रार चक्र में केंद्रित हो जाता है तो व्यक्ति निश्चय ही समाधी अवस्था को प्राप्त कर लेता है, जहां पर उसका अस्तित्व ब्रह्म में विलीन हो जाता है.आध्यात्मिक द्रष्टि से यह एक अत्यंत ही उच्चतम अवस्था कही जा सकती है जहां से व्यक्ति विविध ब्रह्मांडीय रहस्यों तथा सत्यों से परिचित होने लगता है. निश्चय ही अगर साधक अपना आध्यात्मिक स्तर इतने उच्च स्तर को प्राप्त करा सकता है तो फिर भौतिक जीवन की तो बात ही क्या. फिर भी अगर कहा जाए तो व्यक्ति के स्मरण शक्ति में उच्चतम विकास होता है, साधक आगंतुक व्यक्ति के मानस में चल रहे विचारों को जानने लगता है, ध्यान में लिन हो सकता है तथा अभ्यास के साथ साथ व्यक्ति कई प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति कर सकता है. लेकिन इन सब के मूल में सर्व प्रथम चेतन तथा जागरण प्रक्रियाए है.
साधक को यह समजना चाहिए की अगर कोई पिंड में चेतना नहीं है तो उसका जागरण संभव नहीं हो पता. और जो जागृत नहीं है, उसका विकास नहीं किया जा सकता और अगर वह विकास हो भी जाए तो सुसुप्त अवस्था होने के कारण यह विकास अर्थहिन् ही है.
कुण्डलिनी क्रम में पहले कुण्डलिनी को चेतन कर सभी चक्रों को धीरे धीरे चेतन किया जाता है तथा उसके बाद जागरण किया जाता है. यह क्रिया अत्यंत ही पेचीदी तथा जटिल है. लेकिन प्रस्तुत देव दुर्लभ प्रयोग अपने आप में एक आश्चर्य है. इसका कारण यह है की यह सीधे ही सहस्त्रार चक्र अर्थात शिव स्थान को चेतन और जागरण करने की साधना है. अगर व्यक्ति इस साधना को सम्प्पन कर ले तो निश्चय ही वह सहस्त्रार चक्र से सबंधित सभी प्रारंभिक लाभों की प्राप्ति करने में समर्थ होने लगता है. सहस्त्रार से जरने वाले अमृत तत्व का उसको भान होने लगता है तथा शरीर में तत्वों का संचारण योग्य होने से साधक के रोग शोक भी शांत होने लगते है. साथ ही साथ साधक को कई प्रकार की आध्यात्मिक उपलब्धिया तो होती ही है. ऐसे गुप्त प्रयोग को प्राप्त करना निश्चय ही सौभाग्य हइस देव दुर्लभ प्रयोग को पारदशिवलिंग अथवा सौंदर्य रस कंकण के माध्यम से सम्प्पन किया जाता है.
यह प्रयोग साधक किसी भी शुभदिन शुरू कर सकता है.या पूणिमा पर ये साधना करे |
समय दिन या रात्रि का कोई भी हो लेकिन साधक को रोज एक ही समय पे यह प्रयोग करना चाहिए.
साधक स्नान आदिसे निवृत हो कर सफ़ेद वस्त्रों को धारण करे तथा सफ़ेद आसान पर बैठ जाए. साधक का मुख उत्तर दिशा की तरफ रहे.

साधक को अपने सामने प्राणप्रतिष्ठित विशुद्ध पारदशिवलिंग को स्थापित करना चाहिए. इसके बाद साधक गुरुपूजन तथा पारदशिवलिंग का पूजन सम्प्पन करे.

साधक को पूजन करने के बाद गुरुमंत्र का जाप करना चाहिए.

उसके बाद मंत्र सिद्ध सहस्रार चक्र Sahsrara Yantra शिव लिंग के सामने मूल मंत्र का जाप करें

माया कुण्डलिनी क्रिया मधुमती काली कला मालिनी ,
मातंगी विजया जाया भगवती देवी शिवा शाम्भवी,
शक्तिः शंकरा वल्लभा त्रिनयना वाग्वाहिनी भैरवी ,
ओमकार त्रिपुरा परार्मयि भगवती माता कुमारेश्वरी।।


इसके बाद साधक शिवलिंग पर त्राटक करते हुवे निम्न मंत्र की ११ माला मंत्र का जाप करे. यह जाप साधक माला से करे.

ॐ शं शां शिं शुं वं वां विं वुं अमृत वर्चसे वर्चसे सोहं हंसः स्वाहा
(Om sham shaam shim shum vam vaam vim vum amrit varchase varchase soham hansah swaha)

मंत्र जाप पूर्ण होने पर साधक थोड़ी देर आँखे बंद कर के शांत चित्त से बैठ जाए. इस प्रकार साधक को ५ दिन तक करना है.

सहस्रार चक्र साधना सामग्री ओम नमः शिवाय

साधक को इन ५ दिन में कई प्रकार के अनुभव हो सकते है और कई द्रश्य दिखाई दे सकते है तथा विविध आवाजे सुने दे सकती है लेकिन साधक को विचलित नहीं होना चाहिए, यह सब साधना में सफलता के ही लक्षण है. माला का विसर्जन नहीं करना है, साधक भविष्य में भी इस माला का प्रयोग इस साधना को करने के लिए कर सकता है.

सहस्रार चक्र साधना

सहस्रार का शाब्दिक अर्थ है- एक हजार। इसी कारण इसे हजार पंखुड़ियों वाला कमल अथवा सहस्रदल कमल के रूप में भी कहा और जाना जाता है। इसमें निहित तात्पर्य यह है कि इसमें छिपी हुई शक्ति अनन्त है, इसका महत्त्व असीम है। इसीलिए इसका वर्णन योगियों ने एक ऐसे अनन्त पंखुड़ियों वाले कमल के रूप में भी किया है, जिसकी पंखुड़ियाँ या तो लाल हैं या फिर अनेक रंगों वाली हैं। शास्त्रकारों ने इसे बड़ी ही साँकेतिक रूप से स्पष्ट किया है-

सहस्रारं महापद्मं शुक्लवर्णमधोमुखम्। अकारादिक्षकारान्तैः स्फुद्वर्णेर्विराजितम्॥

अनुभवी साधकों ने इस साँकेतिक स्पष्टीकरण की व्याख्या करते हुए कहा है कि आज्ञाचक्र के ऊपर महानाद है। इसके ऊपर शंखिनी नाड़ी है। उसके अग्रभाग में अर्थात् शून्याकार स्थान में तथा ब्रह्मरन्ध्र में स्थित प्रकृति रूप विसर्ग के निम्न प्रदेश में प्रकाश स्वरूप पूर्ण चन्द्रमा के समान अत्यन्त श्वेत वर्ण अधोमुख आनन्द स्वरूप सहस्रदल कमल है। इसका केशर समूह रक्त और भास्वर है तथा अकार से लेकर क्षकार पर्यन्त पचास मातृकाओं से यह कलम विभूषित है।इस सहस्रदल कमल में दलों के बीस घेरे हैं। प्रति घेरे में पचास दल हैं। इनमें से प्रत्येक वृत्त के दलों में ‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ पर्यन्त पचास अक्षर सुशोभित हैं। इस सहस्रदल कमल की वर्णिका में स्निग्ध, निर्मल, पूर्ण चन्द्र मण्डल है। उसके भीतर विद्युत के समान चमकदार त्रिकोण है। इस त्रिकोण के मध्य में सब देवों से सेवित अत्यन्त गुप्त शून्य रूप पर बिन्दु है।

महामोक्ष का प्रधान मूल रूप यह सूक्ष्म कन्द ‘अमा’, ‘कला’ और ‘निर्वाण’ कला से युक्त है।

इस चक्र की स्थिति अन्य चक्रों से बहुत परे है। इसीलिए चक्र संस्थान का वर्णन करते समय प्रायः षट्चक्रों की ही चर्चा की जाती है। क्योंकि अन्य चक्रों की स्थिति मानसिक स्तर पर है। अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय चक्र के आधार पर ही चेतना के स्तर का प्रकटीकरण होता है। इस सम्बन्ध में यह भी कहा जा सकता है कि सहस्रार चक्र बिना किसी माध्यम के ही क्रियाशील होता है। और साथ ही साथ इसकी क्रियाशीलता में सभी माध्यमों का योगदान है। वस्तुतः इसकी स्थिति परात्पर है, फिर भी अनुभवगम्य है। यह पूर्ण रूप से विकसित चेतना का चरम बिन्दु है। इस क्रम में यह भी उल्लेखनीय है कि अन्य चक्रों की शक्ति उनमें समाहित नहीं होती। ये चक्र तो मात्र स्विच की तरह है और उनकी सभी क्षमताएँ सहस्रार में ही निहित रहती हैं।इसकी स्थिति अनुभवातीत होने के कारण निर्विकार है। इसके बारे में बहुत कुछ कहना अथवा लिखना सम्भव नहीं। बस बहुत अधिक कुछ बताना ही हो तो शाब्दिक संकेत भर किए जा सकते हैं।

यह शून्य है अर्थात् पूर्ण रूप से रिक्त है। यह पर ब्रह्म परम शिवा है। यह सब कुछ है और कुछ भी नहीं है। सच तो यह है कि यह तर्क से सर्वथा परे की स्थिति एवं अवस्था है। क्योंकि तर्क में एक की दूसरे से तुलना की जाती है। लेकिन सहस्रार तो सम्पूर्णता का द्योतक है। फिर भला इसकी तुलना और व्याख्या, विवेचना किस तरह से की जाय। दरअसल यह सभी मान्यताओं का स्रोत होते हुए भी सारी मान्यताओं से परे है। यह चेतना और प्राण का मिलन बिन्दु है। योग साधना का चरम बिन्दु यही है।

योगी की जाग्रत् चेतना शक्ति जब यहाँ तक पहुँचती है तो इसे शिव और शक्ति का मिलन कहते हैं। इस महामिलन की अनुभूति सर्वथा भिन्न एवं विशिष्ट है। इसी के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में आत्मज्ञान अर्थात् समाधि अवस्था का प्रारम्भ होता है। इस अवस्था में व्यक्तिगत अहं का लोप हो जाता है। इसका मतलब यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि स्थूल देह का ही नाश हो जाता है। बस इसका तात्पर्य तो इतना ही है कि व्यक्तिगत भावना ही समाप्त हो जाती है। ऐसी दशा में साधक में अपने पराए-पन का भान नहीं रहता। दृश्य एवं दृष्ट दोनों एक रस हो जाते हैं। यहाँ द्वैत भाव अपना अस्तित्व ही खो देता है। बस एक मात्र परा चेतना ही सर्वत्र समरस-एकरस होकर विराजती है।इस अद्भुत स्थिति का वर्णन दुनिया की प्रत्येक साधना पद्धति में अपने-अपने ढंग से किया गया है। योग के विभिन्न सम्प्रदाय, समुदाय एवं मार्ग इसी में अपने चरम बिन्दु को खोजते हैं। कुछ ने इसे निर्वाण कहा, जबकि अन्य ने समाधि, कैवल्य, ब्रह्म साक्षात्कार आदि अनेक नामों, संज्ञाओं से बताने-समझाने की कोशिश की है। यदि विभिन्न रहस्यात्मक तथा योग परम्पराओं एवं शास्त्रों का अध्ययन किया जाय तो सहस्रार के बारे में बहुत सारे वर्णन मिलते हैं। परन्तु इन सभी का अध्ययन एक अलग ढंग से, चेतना के एक भिन्न स्तर से किया जाना चाहिए, तभी उसके सार को समझा जा सकता है।

सहस्रार की उपलब्धि एवं अनुभूति का सबसे अधिक सुग्राह्य एवं कवित्वपूर्ण वर्णन महायोगी स्वामी विवेकानन्द ने किया था। इस सम्बन्ध में उनकी कविता समाधि की पंक्तियाँ इसके रहस्य को उद्घाटित करती हैं-

सूर्य भी नहीं, ज्योति- सुन्दर शंशाक नहीं, छाया सा व्योम में यह विश्व नजर आता है।

मनो आकाश अस्फुट, भासमान विश्व वहाँ अहंकार स्रोत में ही तिरता डूब जाता है।

धीरे-धीरे छायादल लय में समाया जब धारा निज अहंकार मन्द गति बहाता है।

बन्द वह धारा हुई, शून्य में मिला है शून्य ‘अवांग मनस गोचरम’ वह जाने जो ज्ञाता है।सहस्रार की यह अनुभूति योगी को उसके निर्वाण शरीर का परिचय देती है। यह अस्तित्व के विकास का सातवां एवं अन्तिम सोपान है। यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि निर्वाण शरीर या सूक्ष्म शरीर दरअसल कोई शरीर ही नहीं है। यह तो परम अवस्था है। यहाँ केवल शून्य है। शून्य के अलावा कुछ भी नहीं है यहाँ। निर्वाण-शब्द का अर्थ ही है- सब कुछ समाप्त, शून्य बिल्कुल। जिस तरह जलता हुआ एक दीपक बुझ जाता है, फिर क्या होता है? खो जाती है ज्योति। उस समय कोई न कुछ कह पाता है और न बता पाता है। बस ज्योति- महाज्योति में विलीन हो जाती है।

सहस्रार की यह साधना कैसे हो? इसकी सिद्धि किस तरह की जाय? तो इन सवालों का जवाब एक ही है कि इसकी साधना समस्त सिद्धियों का सुपरिणाम है। यदि इसके स्वरूप को बहुत कुछ जानना ही हो, तो फिर इतना ही कहेंगे कि ऐसे जिज्ञासु योग साधक को सतत् गुरु कृपा परम शिवा का आवाहन करना चाहिए।

वर्षों की साधना, भारी तप द्धारा । इस सबके बावजूद जब वह सहस्रार का भेदन व जागरण में सफल न हो तो ,गुरुकृपा स्वरूप वह सब मिल जाता है जो चेतना के विकास का चरम व परम लक्ष्य है।सद्गुरु कृपा के आह्वान के अलावा सहस्रार के जागरण व सिद्धि की अन्य समर्थ साधना नहीं है। बाकी जो कुछ- जहाँ कहीं भी वर्णित है, वह बस शब्दाडम्बर मात्र है। यदि उसमें कोई सार है भी तो भी उसका प्रायोगिक मूल्य बहुत ही न्यून और अल्प है। जबकि सद्गुरु की कृपा के अवतरण को धारण व ग्रहण करने से यह महासाधना शीघ्र ही परम सिद्धि में परिणत हो जाती है, ऐसा अनेकों महायोगियों के अनुभव हैं। इन अनुभवों का साक्षात्कार कुंडलिनी जागरण प्रक्रिया के माध्यम से भी किया जा सकता है।

सहस्रार

  1. कूडंलिनी मंत्र साधना

कुंडलिनी ही हमारे शरीर, भाव और विचार को प्रभावित करती है।
चक्रों के नाम :
मूलत: सात चक्र होते हैं:-

1- मूलाधार,

2- स्वाधीष्ठान,

3- मनीपूर,

4- अनाहता,

5- विशुद्धि,

6- आज्ञा चक्र साधना

7- सहस्रार

8- बिन्दु

सहस्रार चक्र मंत्र साधना

सहस्रार चक्र साधना

सहस्रार चक्र Sahsrara सहस्रार चक्र
सहस्रार =हजार, अनंत, असंख्य

शिव शक्ति शिव धर्म की अनन्त पावर ऊर्जा

सहस्रार चक्र सिर के शिखर पर स्थित है। इसे “हजार पंखुडिय़ों वाले कमल”, “ब्रह्म रन्ध्र” (ईश्वर का द्वार) या “लक्ष किरणों का केन्द्र” भी कहा जाता है, क्योंकि यह सूर्य की भांति प्रकाश का विकिरण करता है। अन्य कोई प्रकाश सूर्य की चमक के निकट नहीं पहुंच सकता। इसी प्रकार, अन्य सभी चक्रों की ऊर्जा और विकिरण सहस्रार चक्र के विकिरण में धूमिल हो जाते हैं।
सहस्रार चक्र में एक महत्त्वपूर्ण शक्ति – मेधा शक्ति है। मेधा शक्ति एक हार्मोन है, जो मस्तिष्क की प्रक्रियाओं जैसे स्मरण शक्ति, एकाग्रता और बुद्धि को प्रभावित करता है। योग अभ्यासों से मेधा शक्ति को सक्रिय और मजबूत किया जा सकता है।

सहस्रार चक्र का कोई विशेष रंग या गुण नहीं है। यह विशुद्ध प्रकाश है, जिसमें सभी रंग हैं। सभी नाडिय़ों की ऊर्जा इस केन्द्र में एक हो जाती है, जैसे हजारों नदियों का पानी सागर में गिरता है। यहां अन्तरात्मा शिव की पीठ है। सहस्रार चक्र के जाग्रत होने का अर्थ दैवी चमत्कार और सर्वोच्च चेतना का दर्शन है। जिस प्रकार सूर्योदय के साथ ही रात्रि ओझल हो जाती है, उसी प्रकार सहस्रार चक्र के जागरण से अज्ञान धूमिल (नष्ट) हो जाता है।
यह चक्र योग के उद्देश्य का प्रतिनिधित्व करता है- आत्म अनुभूति और ईश्वर की अनुभूति, जहां व्यक्ति की आत्मा ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ जाती है। जिसे यह उपलब्धि मिल जाती है, वह सभी कर्मों से मुक्त हो जाता है और मोक्ष प्राप्त करता है – पुनर्जन्म और मृत्यु के चक्र से पूरी तरह स्वतंत्र। ध्यान में योगी निर्विकल्प समाधि (समाधि का उच्चतम स्तर) सहस्रार चक्र पर पहुंचता है, यहां मन पूरी तरह निश्चल हो जाता है और ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय एक में ही समाविष्ट होकर पूर्णता को प्राप्त होते हैं।

सहस्रार चक्र में हजारों पंखुडिय़ों वाले कमल का खिलना संपूर्ण, विस्तृत चेतना का प्रतीक है। इस चक्र के देवता विशुद्ध, सर्वोच्च चेतना के रूप में भगवान शिव है। इसका समान रूप तत्त्व आदितत्त्व, सर्वोच्च, आध्यात्मिक तत्त्व है।

मंत्र साधना के लिये मंत्र साधना सामग्री लेकर – मूल मंत्र ले कर जप करने से सहस्रार जागरण का मार्ग खुलने लगता है | ॐ |
इस मे सभी शक्तियों को सदा परम शिव परब्रम्हा के साथ जोड़ना पड़ता है।

Guleria Sad Guru